अगली दुकान लुहार की थी।
उसकी दुकान पर तरह-तरह की चीज़ें थीं।
वहाँ तवे,
कड़छी
,
जंज़ीरें
और खूब सारी कीलें थीं।
लुहार गर्म-गर्म भट्टी पर कुछ बना रहा था।
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